वो जब कहते हैं
"आपकी ज़ुबान पर सरस्वती बैठती है"
जो भी बोलो, सोच समझ कर ही बोलो
कहीं सच ना हो जाए
वो उसी, उनके द्वारा बनाए गए
सिस्टम के कोड की तरफ ईशारा होता है
ऐसे ऐसे से कितने ही कोडों के इशारे
अक्सर ऐसे ही छुपे बैठे होते हैं
एक तो साइकोलॉजिकल इम्पैक्ट होता है
और दूसरा?
गुप्त सिस्टम हर बात को, हर इशारे को
अपने निहित स्वार्थ के लिए प्रयोग या दुरुपयोग करता है।
जिस किसी में, जिस किसी पार्टी का भला होता है
वो उन्हीं बातों या कामों को
बढ़ाचढ़ा कर या घुमाफिरा कर पेश करते हैं।
चाहे वो सच हो या ना हो
चाहे वो सच के एकदम विपरीत ही क्यों ना हो
जिसके ढेरों उदाहरण एक निगाह दौड़ाने पर
आपके अपने आसपास भरे पड़े मिलेंगे
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